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क्‍या इमरान खान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने शपथ ग्रहण में आमंत्रित करेंगे?

इमरान खान ने पीएम मोदी के साथ अपनी बातचीत में यह सुझाव भी दिया कि पाकिस्तान और भारत की सरकारों को अपने-अपने लोगों को गरीबी के जाल से मुक्त कराने के लिए एक संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए.(फाइल फोटो)
पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्‍ता संभालते वक्‍त दक्षेस (सार्क) देशों के सभी नेताओं को आमंत्रित किया था. पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आए भी थे.
‘नया पाकिस्‍तान’ और ‘चेंज’ का नारा देकर चुनाव में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे इमरान खान 11 अगस्‍त को पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे. इस तारीख के ऐलान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को इमरान खान से बात की और उम्मीद जताई कि पड़ोसी देश में लोकतंत्र अपनी जड़ें गहरी करेगा. उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी किए गए एक बयान के अनुसार मोदी ने पाकिस्तान में लोकतंत्र के जड़े गहरी होने की उम्मीद जताई. बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने पूरे क्षेत्र में शांति एवं विकास का अपना विजन भी दोहराया. इस बीच, इस्लामाबाद में खान की पार्टी ने एक बयान में कहा कि खान ने प्रधानमंत्री मोदी की शुभकामनाओं को लेकर उनका शुक्रिया अदा किया है.

बयान में इमरान खान के हवाले से कहा गया है, ‘‘संघर्षों का समाधान वार्ता के जरिए निकाला जाना चाहिए.’’ इमरान खान ने पीएम मोदी के साथ अपनी बातचीत में यह सुझाव भी दिया कि पाकिस्तान और भारत की सरकारों को अपने-अपने लोगों को गरीबी के जाल से मुक्त कराने के लिए एक संयुक्त रणनीति बनानी चाहिए. उन्होंने कहा कि संघर्षों का हल करने की बजाय युद्ध और खूनखराबा त्रासदियों को जन्म देंगे.

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पाकिस्‍तान की अवाम का एक तबका इमरान खान को ‘गेमचेंजर’ के रूप में देख रहा है. उनको सर्वशक्तिशाली पाकिस्‍तानी सेना (इस्‍टेब्लिशमेंट) का भी समर्थन माना जा रहा है. चुनाव से कुछ वक्‍त पहले पाकिस्‍तानी जनरल कमर जावेद बाजवा ने भी परोक्ष रूप से संकेत देते हुए कहा था कि भारत के साथ बातचीत ही एकमात्र तरीका है. लेकिन भारत शुरू से इस मामले में एकदम स्‍पष्‍ट रहा है. उसका मानना है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के साथ ही बातचीत हो सकती है.

पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्‍ता संभालते वक्‍त शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस (सार्क) देशों के सभी नेताओं को आमंत्रित किया था. पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आए भी थे.(फाइल फोटो)

इस पृष्‍ठभूमि में पीएम मोदी और इमरान खान की खुशनुमा माहौल की बातचीत के बाद दोनों तरफ के अमन पसंद लोगों को फिर से उम्‍मीद बंधी है. इस तरह के सवाल और सुझाव आने लगे हैं कि इमरान खान को अपने शपथ ग्रहण समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित कर ‘दोस्‍ती’ के माहौल की शुरुआत करनी चाहिए. कहा जा रहा है कि यह भी ठीक उसी तरह का ‘मास्‍टरस्‍ट्रोक’ हो सकता है, जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्‍ता संभालते वक्‍त अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस (सार्क) देशों के सभी नेताओं को आमंत्रित किया था. पाकिस्‍तान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आए भी थे.

सेना का सवाल
हालांकि यह भी कहा जाता है कि जब नवाज शरीफ यहां आए थे तो उससे पहले भारतीय प्रधानमंत्री के आमंत्रण को स्‍वीकार करने में उनको कई दिन लग गए थे. माना जाता है कि पाकिस्‍तान सेना इस आमंत्रण को स्‍वीकार करने के खिलाफ थी. लेकिन नवाज शरीफ नहीं माने. यह भी कहा जाता है कि इस एपिसोड के बाद उनके सेना के साथ रिश्‍ते असहज होने शुरू हो गए. माना जाता रहा है कि नवाज शरीफ, भारत के साथ संबंध सुधारने के इच्‍छुक थे लेकिन अपनी सेना के कारण वह ऐसा नहीं कर सके. यह भी कहा जाता है कि भारत के साथ दोस्‍ती की चाह के कारण ही उनको सत्‍ता से बेदखल होना पड़ा. इस पृष्‍ठभूमि में बड़ा सवाल यही है कि क्‍या पाक सेना से अलग स्‍वतंत्र रुख अपनाते हुए इमरान खान भारतीय प्रधानमंत्री को अपने शपथ ग्रहण में आमंत्रित करेंगे?

जनरल बाजवा ने कहा है कि मोदी सरकार अपने सख्‍त रुख के कारण पाकिस्‍तान के साथ बातचीत नहीं कर रही है.(फाइल फोटो)
ये सवाल इसलिए भी तार्किक है क्‍योंकि ये सोच बाजवा डॉक्ट्रिन(सिद्धांत) के काफी करीब है. दरअसल सत्‍ता से शरीफ की विदाई के बाद पाकिस्‍तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा अचानक भारत को लेकर दिए अपने बयानों के कारण हालिया दौर में सुर्खियों में रहे हैं. जनरल बाजवा ने कुछ समय पहले कहा कि भारत-पाक के बीच कश्‍मीर समेत सभी विवादों का हल विस्‍तृत रूप से सार्थक बातचीत से ही निकल सकता है. उन्‍होंने ये भी कहा है कि मोदी सरकार अपने सख्‍त रुख के कारण पाकिस्‍तान के साथ अभी बातचीत नहीं कर रही है लेकिन अपनी तेज गति से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था के कारण उसको अगले दो-तीन साल के भीतर पाकिस्‍तान के साथ बातचीत करने की दरकार होगी.

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इसके साथ ही उन्‍होंने हाल में यह भी कहा है कि पाकिस्‍तान को ऐसे शांतिप्रेमी देश के रूप में स्‍थापित करने का सपना देखते हैं जो दुनिया के साथ शांतिपूर्ण और सह-अस्तित्‍व की भावना के साथ रहना चाहता है. इन सारे बयानों को यदि एक साथ जोड़कर देखा जाए तो इसको पाकिस्‍तानी विदेश नीति के संदर्भ में बाजवा डॉक्ट्रिन(सिद्धांत) कहा जा रहा है.

अब इस तरह के बाजवा सिद्धांत के बीच इमरान खान विदेश नीति के संदर्भ में अपने लिए क्‍या स्‍पेस निकाल पाते हैं, ये देखने वाली बात होगी, हालांकि इमरान खान पिछले कई वर्षों से इस बात पर ही जोर दे रहे हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिये ही समस्‍या का समाधान हो सकता है. अपनी जीत के विजय संदेश में कश्‍मीर का राग अलापने के बावजूद उन्‍होंने यह बात कही. सो, भारत से दोस्‍ती के संदर्भ में गेंद अब इमरान खान के पाले में है और देखना यह है कि अपने जमाने के महानतम आलराउंडरों में शुमार रहे इमरान खान इस गेंद पर बैटिंग कैसे करते हैं?

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