गंगा को हम मां कहते हैं और आखिर मां को बीमार होता भला कौन देख सकता है…

गंगा को हम मां कहते हैं और आखिर मां को बीमार होता भला कौन देख सकता है…

11th November 2018 0 By Deepak Kumar

गंगा घाट पर छठ को लेकर हिन्दुस्तान के स्वच्छता अभियान का दूसरा दिन था। हम हिन्दुस्तान परिवार और शहर के सोच-समझ वाले लोगों के साथ बरारी सीढ़ी घाट की साफ-सफाई शुरू कर रहे थे कि घाट के तथाकथित रखवालों ने विरोध शुरू कर दिया।
जब उनको परिचय और अखबार का हवाला दिया गया तो माफी मांगी, मगर सहयोग करने नहीं आए। बरबस ही कैलाश गौतम की पंक्तियां याद आ गईं-
दिन उगते ही ग्रहण लग गया, उग्रह होते शाम हो गई।
जब से मरा भगीरथ, गंगा घड़ियालों के नाम हो गई।।

जिस घाट पर छठ महापर्व होना है, जहां रोज हजारों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं, उसी घाट पर गंदा नाला सीधे गंगा में गिरता है। हमने उस नाले में भी उतरकर सफाई करने में परहेज नहीं की मगर यह क्या? जहां एक तरफ हम कचरा निकाल रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लोग लगातार उसमें पालीथिन और कचरा फेंके जा रहे थे। छठ पवित्रता का महापर्व है और गंगा हमारी आस्था ही नहीं, संस्कृति का भी सवाल है। बिना गंगा के देश की कल्पना नहीं की जा सकती। यह देश की आत्मा है। परिवार की सबसे बुजुर्ग महिला के लिए जो श्रद्धा भाव हर व्यक्ति रखता है, कम से कम उसी तरह का मान-सम्मान गंगा को निजी स्तर पर देना होगा। केवल सरकारी योजनाओं या संस्थाओं द्वारा समय-समय पर अभियान चलाने मात्र से गंगा साफ नहीं हो सकती।

हमारा उद्देश्य महान और निश्चय दृढ़ था, इसलिए हमलोग शहर के समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों की टीम के साथ सफाई व्यवस्था में लग गए। मगर यहां बहुत कुछ देखना बाकी था। घाट के किनारे मल-मूत्र त्यागने वालों में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं, जो स्नान कर पुण्य कमाने आई थीं। ऐसा नहीं कि वहां शौचालय की व्यवस्था नहीं थी, मगर जागरूकता की ऐसी कमी कि श्रद्धालु दातुन से लेकर कपड़ा साफ करने तक सब कुछ गंगा घाट पर ही कर लेना चाहते थे। समाजसेवी और पंडित जटाशंकर मिश्र ने कई बार कहा कि गंगा में कभी चरण नहीं धोना चाहिए, लेकिन लोग तो यहीं सब कुछ धो लेना चाहते थे। हमने पंडित जी को विश्वास दिलाया कि जागरूकता फैलाने में हम कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। आखिर गंगा को हम मां कहते हैं और मां को बीमार होता भला कौन देख सकता है।
गंगा सिर्फ नदी ही नहीं, हमारी संस्कृतियों के मिलन का संगमस्थल है। इसका जल केवल पानी नहीं, इसमें चेतना और आध्यात्मिकता का रंग भरा है। यह सिर्फ घाटों पर ही नहीं, हर भारतीय के मन में भी बहती है। नारित्व का जयघोष और स्त्री अस्मिता का प्रतीक है गंगा। गंगा पर गौर करें तो पहाड़ से मैदान तक इसकी इंद्रधनुषी मुद्राओं को हम लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। एक भगीरथ इसे धरती पर लाए, मगर इसे साफ करने में अब करोड़ों को वही भूमिका निभानी होगी। आखिर भागलपुर की होकर यहां से दूर क्यों होती जा रही है गंगा?

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