गरदा धूरदा फांकना है तो आईए भागलपुर

शहर में साफ सफाई वाला विभाग इन दिनों फिर दो इंच उपर है। हाल में विभाग में खर्च पर चर्चा हुई। चर्चा के नाम पर कुछ मोहल्ले वाले नेताओं ने जमकर हंगामा किया। कुछ भाई लोग इतना गुस्सा गए कि चर्चा छोड़कर घर चले गए।

नागरिक भी परेशान आखिर ऐसा क्या हो गया कि मोहल्ले वाले नेताजी लोग हत्थे से उखड़ गए। चर्चा करने वाले साहब को भी खरी खोटी सुनाई। खैर, शहर के नागरिकों ने सोचा शहर की साफ सफाई और नागरिक सुविधाओं के लिए नेताजी लोग गुस्साए हैं। पर ऐसा कहीं कुछ नहीं था।

अंदर खाने से पता चला कि नेताजी लोग चार हजारी बैग के लिए गुस्साए थे। नए वाले साहब ने कह दिया कि इतना खर्च नहीं हो सकता। फिर क्या था। मोहल्ले वाले नेताजी लोग लाल-पीले हो गए। चार हजारी बैग तो एक मुद्दा था इसके साथ ही अपनी गोटियां भी लाल न होने की खीज भी थी। नए वाले साहब के नियम कानून के चक्कर में किसी की गोटियां लाल नहीं हो पा रही है। इसी खीज में भी भाई लोग गुस्सा गए।

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। चर्चा के दौरान अपनी हनक दिखाने के चक्कर में सभी ने उछल-उछल कर साहब को उंगली तो दिखा दी। अब पेंच फंस गया। बाद में सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले और चर्चा छोड़कर घर जाने वाले मोहल्ले वाले नेताजी का सारा काम अटक गया। एक तरफ जनता दूसरी तरफ अपनी हनक। जनता तो हनक नहीं देखना चाहती है, वो तो वोट के बदले काम चाहती है।

अब बेचारे नेताजी चुपचाप फिर साहब से मिले और बोले गलती हो गई। विकास का काम हो जाए तो अपनी दुकान चलती रहेगी। बेचारे साहब, सब कुछ भूलकर मान गए। मोहल्ले में विकास कराने की हामी भर दी। इधर, छोटे भाई ने अपनी दुकान चलाने के लिए रात में शहर की सफाई करानी शुरू करा दी। यह सब मैडम को कैसे सुहाता। उन्होंने छोटे भाई की सफाई व्यवस्था की पोल खोलने के लिए अपने मोहल्ले की सफाई का मुद्दा उठा दिया।

तब पता चला कि मोहल्लों में सफाई हो ही नहीं रही है। सड़क पर सफाई कराकर जनता को धोखा दिया जा रहा है। संकट इस बात का है कोई इस शहर की जनता की समस्या देख ही नहीं रहा है। सब अपनी दुकान चलाने के लिए परेशान हैं। दुकान भी उसी जनता को गुमराह करने का नया तरीका है। बहरहाल, जनता सब जानती है। वो अपनी दुकान वोट के समय चलाएगी। तब नेता जी को समझ आएगा।

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