गोरखपुर में भाजपा, फूलपुर में सपा अागे, बिहार में महागठबंधन को बढ़त

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर, फूलपुर और बिहार की अररिया समेत दो विधानसभा सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। शुरुआती रुझान आना शुरू हो गया है। यूपी के गोरखपुर से भाजपा अौर फुलपुर से सपा उम्मीदवार अागे चल रहे हैं। फूलपुर में सपा नागेंद्र पटेल और भाजपा के कौशलेंद्र पटेल के बीच बढ़ा वोटों का अंतर। सपा की बढ़त बरकरार है। सपा प्रत्याशी नागेंद्र पटेल 2019 वोटों से आगे चल रहे हैं। वहीं गोरखपुर से भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ल लगभग 3000 वोटों से बढ़त बनाए हुए हैं।

 

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की साख दांव पर है। वहीं बिहार में पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सभी की निगाहें हैं। अररिया से राजद उम्मीदवार सरफराज आलम भाजपा उम्‍मीदवार प्रदीप सिंह से आगे चल रहे हैं। अररिया में पोस्ट बैलेट की गिनती जारी है। आरजेडी के सरफराज आलम 2000 वोटों से आगे चल रहे हैं। सभी सीटों पर 11 मार्च को वोट डाले गए थे।

 

 

यूपी में औसत मतदान

 

उत्तर प्रदेश में हुए लोकसभा उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहा। इन सीटों पर हुए मतदान को आगामी आम चुनावों से पहले भाजपा के लिए एक इम्तिहान माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन कार्यालय से जारी बयान में कहा गया कि गोरखपुर में 43 फीसदी मतदाताओं ने जबकि फूलपुर में 37.39 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया।

 

जानिए क्या होगा असर

 

इन लोकसभा सीटों के नतीजे न सिर्फ यूपी बल्कि केंद्र की राजनीति के सियासी समीकरणों में भी बड़ा बदलाव लाएंगे। खासतौर पर गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव को राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और सपा-बसपा की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है। गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव से पहले यूपी की राजनीति ने नई करवट ली है। मतदान से ठीक पहले जहां चिर प्रतिद्वंद्वी सपा-बसपा ने हाथ मिला लिया, वहीं राज्यसभा चुनाव में सपा-बसपा के साथ कांग्रेस भी भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आ गई है।

 

जाहिर तौर पर अगर उपचुनाव के नतीजे सपा के पक्ष में रहे तो इन तीनों दलों के लोकसभा चुनाव से पूर्व एक मंच पर आने की संभावना और मजबूत हो जाएगी। चूंकि ये दोनों सीटें सीएम योगी और डिप्टी सीएम मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई है, इसलिए इसे न सिर्फ भाजपा बल्कि योगी-मौर्य की प्रतिष्ठा से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। अगर सत्तारूढ़ दल अपनी दोनों सीटें जीतने में कामयाब रहा तो सपा-बसपा-कांग्रेस के एक मंच पर आने की संभावनाओं पर ग्रहण लगने के आसार बनेंगे।

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