तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने को हंसते-हंसते शहीद हो गए थे 60 वीर बाकुरे

तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने को हंसते-हंसते शहीद हो गए थे 60 वीर बाकुरे

10th August 2018 0 By Kumar Aditya

मुंगेर जिले के तारापुर थाने पर तिरंगा फहराते हुए देश की स्वतंत्रता के 60 से अधिक दीवाने शहीद हो गए थे। 15 फरवरी 1932 की दोपहर में भारत माता की आजादी के सैकड़ों दीवाने मुंगेर जिले के तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने के लिए जमा हुए थे। उन वीर बाकुरे सेनानियों की टोलियों ने फिरंगियों की गोलिया खाकर भी थाने पर तिरंगा फहरा कर ही दम लिया था। उसमें 60 से ज्यादा सपूतों को शहादत देनी पड़ी थी। लेकिन उसकी चिंता छोड़ सारे लोगबाग थाने पर ध्वज फहराने की सफलता के जश्न मनाने में डूब गए थे। उनमें देशभक्ति की भावना हिलोरें ले रही थीं।

उस गोलीकाड के बाद काग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर हर साल देश में 15 फरवरी को तारापुर दिवस मनाने का निर्णय लिया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी 1942 में तारापुर की यात्रा कर वहा के 34 शहीदों के बलिदान का उल्लेख किया था।

 

आजादी के उपरात हर वर्ष यहा यह दिवस समारोह पूर्वक मनाया जाने लगा। उसकी सभा में आज भी देश के उन वीर सपूतों की साहसिक गाथा सुनाई जाती है। 15 फरवरी को थाने पर तिरंगा लहराने को संकल्पित सेनानियों की जमघट लगी हुई थी। उनके हाथों में तिरंगे और होठों से वंदे मातरम व भारत माता की जय के नारे गूंज रहे थे। दो-तीन सेनानियों की टोली तिरंगा लिए थाने की ओर बढ़ती और फिरंगी सिपाहियों की गोलिया खाकर जमीन पर गिर जाती। इस तरह दर्जनों सेनानियों के शहीद होने के बाद आखिरकार उन्होंने थाने पर तिरंगा फहरा कर ही दम लिया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े गोली काडों में शुमार उस घटना को याद कर आज भी लोग देशभक्ति के जज्बे से भर उठते हैं। उन शहीदों की याद में उनके सिर नत हो जाते हैं।

 

तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने का दायित्व युवा स्वतंत्रता सेनानियों के धावक दल को सौंपा गया था। उनका मनोबल बढ़ाने के लिए थाने के आसपास बड़ी संख्या में देशभक्त लोगों की भीड़ जमा थी। वे भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे। उनके इस अभियान को नाकामयाब बनाने के लिए ब्रितानी कलक्टर ई ओली एवं एसपी डब्ल्यू फ्लैग के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात थे। हाथ में तिरंगा लिए भीड़ को चीरती स्वतंत्रता सेनानियों की टोली तीर की तरह थाने की ओर बढ़ती थी और पुलिस की बंदूक से छूटी गोलिया खाकर बीच राह में ही गिर पड़ते थे। वहा भारत माता की जय और गोलिया की तड़तड़ाहट के बीच अविराम संगति चल रही थी। लेकिन न कोई भाग रहा था और न देशभक्तों की टोलियों के पाव रुक थम रहे थे। उस अनूठी देशभक्ति के दम पर आखिरकार वे वहा तिरंगा फहराने में सफल रहे थे। घटना के बाद अंग्रेजों ने कई शहीदों के शव वाहनों में लाद कर सुल्तानगंज स्थित गंगा नदी में बहा दिए थे। शहीद सपूतों में से केवल 13 की ही पहचान हो पाई थी। उनमें विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढिय़ा), रामेश्वर मंडल (पड़भाड़ा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगाव) शामिल थे। 31 अज्ञात शव भी मिले थे, जिनकी पहचान नहीं हो पाई थी। कुछ अन्य शव गंगा की गोद में समा गए थे।

 

तिलकामाझी भागलपुर विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रो. रमन सिन्हा के अनुसार स्वतंत्रता सेनानियों ने शभूगंज थाने के खौजरी पहाड़ के सुनसान स्थान पर बैठक कर तारापुर पुलिस थाने पर झडा फहराने की योजना बनाई थी। इतिहासकार डीसी डीन्कर ने अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान’ में भी तारापुर की इस घटना का जिक्र करते हुए संता पासी के योगदान का विशेष रूप से उल्लेख किया है।

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