Bihar NATIONAL Politics

नवयुवकों के सहारे 2020 की राजनीतिक बैतरणी पार करने की कोशिश में नीतीश, नई योजनाओं से जीत रहे भरोसा

आज देश में युवाओं की लगातार बढ़ती आबादी की तरफ तमाम राजनीतिक पार्टियों का ध्यान केंद्रित है। युवाओं को फोकस में रखकर कई योजनाएं बनायी गयीं हैं और उनपर काम चल रहा है। युवाओं की शिक्षा, उनके स्वास्थ्य और रोज़गार के लिए उन प्रयासों का बहुत असर देखने को भी मिला है। हालांकि साक्षरता के मामले में दूसरे राज्यों की तुलना में बिहार थोड़ा पीछे है। वर्ष 2011 की जनसंख्या के मानक पर बिहार की साक्षरता दर जहां 63.82 फीसदी थी तो तमिलनाडु जैसे राज्यों की 80.33 फीसदी आबादी साक्षर होकर हमारे सामने कई सवाल पैदा करती रही हैं। आजादी के बाद से लगातार युवाओं की बढ़ती आबादी को देश में मानव संसाधन के तौर पर बखूबी इस्तेमाल नहीं किया जा सका जिससे आज बिहार समेत देशभर में बड़ी युवा आबादी बेरोज़गारों की कतार में खड़ी हैं। अनुमान के मुताबिक वर्ष 2012 से 2026 की अवधि में देश के कई राज्यों की जनसंख्या में कार्यशील लोगों की संख्या का अनुपात बढ़ेगा वहीं केरल एवं तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह अनुपात घट सकता है। इस दौरान बिहार में युवाओं का अनुपात सबसे ज्यादा होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार युवा शक्ति को लेकर काफी संजीदा रहे हैं लेकिन देश में युवाओं के लिए रोज़गार के सवाल पर प्रधानमंत्री लगातार आलोचनाओं को झेलते रहे हैं और मोटे अनुमान के मुताबिक साल 2017 तक तकरीबन 40 करोड़ 84 लाख से ज्यादा बेरोज़गार युवा आबादी देश की तरक्की को मुंह चिढ़ा रहे हैं। मैककिंसी ग्लोबल इंस्टिट्यूट के मुताबिक, साल 2011 से 2015 के बीच खेती से जुड़े रोजगार 2 करोड़ 60 लाख तक सीमित हो गए जबकि गैर-कृषि रोजगार का आंकड़ा बढ़कर 3 करोड़ 30 लाख तक पहुंच गया। हालांकि इस आंकड़े में तमाम तरह की बेरोज़गार आबादी शामिल है लेकिन गौर करने वाली बात ये भी है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में बेरोज़गारों की संख्या में थोड़ी कमी देखने को मिली लेकिन ये साफ नहीं हो पाया कि आखिर युवा नौकरियों को लेकर गंभीर नहीं हैं या फिर वे उद्यमी बनने की राह पर निकल पड़े हैं।

श्रम मंत्रालय की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक टेक्सटाइल्स और ऑटोमोबाइल्स समेत आठ क्षेत्रों में रोजगार पैदा होने की गति पिछले सात सालों में सबसे कम रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1 करोड़ 20 लाख भारतीय हर साल वर्कफोर्स का हिस्सा बनते हैं। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार अपना सर्वाधिक महत्वाकांक्षी रोजगार सर्वेक्षण करवा रही है। इससे पूरे देश में अब तक पैदा हुए रोजगार की स्थिति स्पष्ट होगी। इससे प्रधानमंत्री को भी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अजेंडा तय करने में मदद मिलेगी क्योंकि प्रधानमंत्री ने 2014 के आम चुनावों में हर साल 1 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था लेकिन असली तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है। इधर, बिहार में लगातार बेरोज़गारों की कम होती संख्या ने सरकार को नई ऊर्जा दी है क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों में पिछड़े बिहार को मानव संसाधन के रूप में तरक्की का नया रास्ता मिला है। बिहार का विकास दर इस साल 10.3 फीसदी रहा जो देश के विकास दर की तुलना में तीन प्रतिशत ज्यादा है। बिहार में इस वर्ष 2018-19 के बजट को देखें तो पता चलेगा कि युवाओं पर ख़ासा ज़ोर दिया गया है। राज्य की नीतीश सरकार को पता है कि एक बड़े वोट बैंक को साधने के लिए उसे पहले खुश करना पड़ेगा।

इस बार के बजट में युवाओं से जुड़ी कई घोषणाओं ने ऐसी बातों को साबित भी किया है। बिहार में तीन नए सरकारी विश्वविद्यालयों की स्थापना की जा चुकी है और पूर्णिया, पाटलिपुत्र तथा मुंगेर विश्वविद्यालय में वर्तमान शैक्षणिक सत्र से पढ़ाई भी शुरू की जाएगी। इसके साथ ही युवाओं को तकनीकी शिक्षा और रोज़गार परक शिक्षा देने पर काम चल रहा है। जहां बड़ी संख्या में आईटीआई कॉलेज खोले जा रहे हैं वहीं, सायंस सिटी के निर्माण को भी 2020 तक पूरा करने की योजना है। इसके साथ ही आईटी और अन्य तकनीकी पढ़ाई पर ज़ोर देने के साथ ही सरकार जीविका एवं स्वयं सहायता समूहों के जरिए बड़ी संख्या में स्वरोज़गार और आर्थिक संपन्नता बढ़ाने पर काम कर रही है। नीतीश लगातार जिस तरह से शराब एवं अलग-अलग प्रकार के नशा, दहेज एवं बाल विवाह के खिलाफ़ प्रखर अभियान चला रहे हैं उससे विकसित बिहार का सपना पूरा करने का दूरगामी लक्ष्य भी समाहित है। वो लगातार कहते रहे हैं कि बिना सामाजिक अभियान के विकास का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

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