बिहार:मुखाग्नि देने को ब्लैकमेलिंग का खुलेआम खेल,10 से 12 लोगों का है रैकेट, दिन के हिसाब से मिलता है घाट

बिहार:मुखाग्नि देने को ब्लैकमेलिंग का खुलेआम खेल,10 से 12 लोगों का है रैकेट, दिन के हिसाब से मिलता है घाट

14th March 2018 0 By Kumar Aditya

घाट से लेकर विद्युत शवदाह गृह तक हो रही पैसे की अवैध वसूली, देखनेवाला कोई नहीं

पटना : इसे सामाजिक विडंबना ही कहा जायेगा कि विद्युत शवदाव गृहों पर सांकेतिक मुखाग्नि देने के लिए मनमानी वसूली की जा रही है. सरकारी एजेंसियां चुप हैं. लोग बेबस हैं. त्रासदी ये है कि मानवीय संवेदना ताक पर रखकर की जा रहे ये वसूली परंपरागत कर्मकांड के नाम पर की जा रही है.

 

जानकार इसे धार्मिक ब्लैकमेलिंग बताते हैं. मुखाग्नि की इस रस्म से मृतक को स्वर्ग मिले या न मिले लेकिन ये तय है कि शोकाकुल लोग शहर के विद्युत शवदाह गृहों से रोजाना अपमान की पीड़ा लेकर लौटते हैं, ये पीड़ा अपनों के बिछड़ने के गम को हाहाकारी बना देती है. बिजली संयत्र में संस्कार के लिए महज एक बटन दबाने के लिए बांस घाट शवदाह गृह पर चल रही ये खास वसूली को लेकर होनेवाली चिक-चिक सहज सुनी जा सकती है. फिलहाल परंपराओं पर लदा अंधविश्वास शोकाकुल परिवार के लिए परेशानी बन गया है.

 

बांस घाट पर श्मशान में लकड़ी से लेकर दूसरी तरह की फिजूल खर्ची के बचने के विद्युत शवदाह गृह का निर्माण किया गया है. लोग बेहद ही समिति खर्च में शव का अंतिम संस्कार पूरा कर सकते हैं, लेकिन शव को आग देने के नाम पर विद्युत शवदाह गृह में भी ब्लैकमेलिंग के खेल चल रहा है. शव को जलाने से पहले आग देने के परंपरा के नाम पर हजारों रुपये की वसूली की जा रही है. शव अाने के साथ ही शवदाह गृह के पास मौजूद आग देने वाले लोग उन परिजनों को पकड़ लेते हैं. पूजा से लेकर अन्य संसाधन लाने का पूरा ठेका लिया जाता है .

 

फिजूल खर्च व समय बचाता है विद्युत शवदाह गृह : अगर कोई व्यक्ति शव को विद्युत शवदाह गृह में जलाना चाहता है तो उसको 300 रुपये निगम के शुल्क के अलावा अपने स्तर पर पूजा पाठ में अधिकतम पांच सौ रुपये खर्च करने होते हैं. आग देने वालों की वसूली को छोड़ दिया जाये तो आठ सौ से एक हजार रुपये में काम किया जा सकता है. वहीं अगर कोई शव को लकड़ी पर जलाया जाता है तो अकेले जलाने के लिए लकड़ी पर दस हजार रुपये खर्च करने होंगे.

 

एक वर्ष से खराब है एक विद्युत ट्रॉली

 

बांस घाट स्थित विद्युत शवदाह गृह में शव को जलाने के लिए दो ट्रॉली है. इन दोनों में पर लाशें जलाई जाती हैं. फिलहाल एक वर्ष से एक ट्रॉली खराब है. उसका क्वायल जल गया है. वर्ष 2014 में इसका निर्माण किया गया था. निर्माण करने वाले ठेकेदार पर निर्माण व पांच वर्ष का रख-रखाव की शर्त भी थी, लेकिन एक ट्रॉली की मरम्मत नहीं की जा रही है. शवदाह गृह में नगर निगम की ओर से दस मजदूर व छह कर्मियों की तैनाती की गयी है. इस समय एक दिन में शवदाह गृह में पांच से सात शवों को जलाया जा रहा है.

 

10 से 12 लोगों का है रैकेट, दिन के हिसाब से मिलता है घाट

 

बांस घाट पर स्थित विद्युत शवदाह गृह व गंगा के घाट पर आग देने वाले लोगों का रैकेट 10 से 12 लोगों का है. जो परंपरा के अनुसार इसे अपना घाट मानते हैं. एक आग देने वाले के कई सहायक भी होते है. इसमें कुछ दूसरे राज्य के भी हैं. इस लोगों ने दिन के हिसाब से अपना घाट बाट लिया है. इस क्रम में एक से दो दिन की वसूली उस व्यक्ति व उनके सहायकों की होती है. कई बार जो वो लोग श्मशान पर अंतिम संस्कार का पूरा ठेका ले लेते हैं. उस क्रम में मनमाना पैसा लिया जाता है.

 

शवदाह गृह व अंतिम संस्कार में उपयोग होने वाले लकड़ी, पंडित, आग देने वाले, सामना से लेकर कुल 20 वस्तुओं का रेट निर्धारित किया गया था. निगम की समिति में प्रस्ताव आने के बाद मामला आगे नहीं बढ़ सका.

 

– विशाल आनंद, उप नगर आयुक्त, नगर निगम

 

वाराणसी की तर्ज पर

 

शुल्क निर्धारित करने का था प्रस्ताव

 

ऐसा नहीं की प्रशासन इनके अवैध व मनमाने पैसा की वसूली की जानकारी नहीं रखता. कई बार शिकायत के बाद नगर निगम में इनके शुल्क निर्धारण की पहल भी की गयी थी. इसमें वाराणसी के गंगा घाटों की तर्ज पर शुल्क निर्धारित करने के लिए सशक्त स्स्थायी समिति में प्रस्ताव रखा गया था लेकिन कुछ नहीं हुआ़

 

आग देने वाले स्टेटस देख कर करते हैं मांग

 

नगर निगम की ओर से एक शव को जलाने के लिए 300 रुपये का शुल्क निर्धारण किया गया है. इसके लिए बकायदा रशीद भी दी जाती है. शवदाह गृह का निर्माण बिहार राज्य जल पर्षद की ओर से किया गया है.

 

वर्तमान में नगर निगम उसका संचालन करता है. शव को उस विद्युत ट्राॅली पर रखने के पहले पूजा पाठ व अन्य कर्मकाड किया जाता है. मगर निगम शुल्क के अलावा भी उन को पैसे देना होता है. पैसे की मांग परिजनों के स्टेट्स को देख कर किया जाता है. अवैध वसूली कई बार 20 हजार रुपये से शुरू होती है.

 

इसके बाद परिजनों व आग देने वाले लोग के बीच मोल-भाव का चलता है और मामला जितने में पट जाये, उतने रुपये की वसूली कर ली जाती है. परिजन कितने भी गरीब हो 500 रुपये से कम किसी भी कीमत पर नहीं लिये जाते हैं.

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