बैंकाक में मसाज, रेव और वाइफ स्वैपिंग वाली पार्टियों में खर्च होता था चारा घोटाले का पैसा, जानें

चारा घोटाला मामले में बिहार के सबसे बड़े सियासी परिवार के मुखिया और राजद सुप्रीमो जेल में बंद हैं. यह घोटाला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक बड़ा घोटाला है. इस घोटाले ने दिखा दिया कि जमीन से जुड़े और सरोकार की राजनीति करने वाले कई लोगों को अपनी फांस में ले लिया. भ्रष्ट व्यवस्था का आलम ऐसा था कि इससे तत्कालीन अधिकारी और राजनेता भी अछूते नहीं रहे. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस घोटाला की नब्बे फीसदी राशि सिर्फ शराब, शबाब और हाइ प्रोफाइल पार्टियों में खर्च हुई. पशुपालन विभाग में उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए एक अधिकारी ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर घोटाले के पैसों के प्रयोग के बारे में ऐसी बातें बतायी, जिसे जानकर आपके होश उड़ जायेंगे.

 

चारा घोटाला के माफियाओं के पास 1977 से 80 के बीच फ्लो में पैसा आना शुरू हुआ और यह 1990 से 1996 के बीच जारी रहा. इस दौरान इन पैसों का जिस तरह से अपनी शाम को रंगीन करने का खेल जारी हुआ, उसे देखकर इसका विरोध करने वाले भी घोटाले के साथ आते गये और चारा घोटाले की 90 फीसदी राशि ऐशो आराम में चली गयी. सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं कि घोटाले के एक आरोपी ने सीबीआइ को दिये अपने बयान में यहां तक कहा है कि उनकी जांघ पर हाइ प्रोफाइल कॉल गर्ल के अलावा घोटाले में अपनी हिस्सेदारी चाहने वाले विभाग से जुड़े लोगों की पत्नियां भी बैठती थीं. उन्होंने बताया कि घोटाले के पैसे से लगातार बिहार से कुछ नेताओं और अधिकारियों का ट्रूप बैंकॉक जाता था. वहां के बड़े होटलों और बार में पार्टियां चलती थी. कुछ लोग बॉडी मसाज करवाते थे और अपनी रात रंगीन कर फिर बिहार वापस होते थे.

 

चारा घोटाले से बैंकॉक, लंदन और स्वीटजरलैंड के होटलों में जाकर पार्टियां की जाती थीं. देश की राजधानी दिल्ली के कई बड़े होटलों की छत पर रातें खुले आसमान के नीचे रंगीन होती थी. होटलों की छत पर बने तालाबों में स्विम सूट में विदेशी लड़कियों के साथ गलबहियां डालकर लोग रात बिताते थे. उस दौरान दिल्ली के चर्चित और फाइव स्टार होटलों में बल्क में कमरे बुक होते थे और घोटाले से जुड़े लोग वहां अपनी रात रंगीन करते थे. इतना ही नहीं पटना के भी नामी होटलों में पार्टियां चलती थी, जहां शराब, शबाब और कबाब का इंतजाम होता था. रेव पार्टियां भी आयोजित की जाती थीं. अन्य शहरों से कॉल गर्ल को मंगाया जाता था. उस पर उस जमाने में लाखों और करोड़ों रुपये खर्च किये जाते थे. सेवानिवृत्त अधिकारी ने बताया कि उस वक्त इस घोटालेे ने इस मामले से दूर रहने वाले कुछ स्वच्छ छवि के नेताओं को अपने चंगूल में फांस लिया और वह भी इसमें धीरे-धीरे शामिल होते गये.

 

पशुपालन विभाग के अधिकारी ने बताया कि उस वक्त पत्नियों की अदला-बदली वाली पार्टियां भी आयोजित होती थीं. उन्होंने कहा कि चारा घोटाले के पैसे से सभी नये ब्रांड की शराब और बियर की बोतलें विदेशों से तस्करी कर मंगायी जाती थीं. पैसा पानी की तरह बहाया जाता था. रांची और पटना में इस तरह की पार्टियों का चलन था. देशी-विदेशी लड़कियों को लाया जाता था और पार्टी में नग्नता की सारी हदें पार कर दी जाती थी. इस दौरान विभाग का कोई व्यक्ति या बाहरी नेता इस कुकृत्य में बाधक बनता था, तो उसे रास्ते से हटा दिया जाता था, या फिर उसका तबादला और उसे बर्खास्त कर दिया जाता था. घोटाले के जमाने में कई हत्या हुई, जिसका सीधा-सीधा चारा घोटाले से ही लिंक था. लेकिन उनकी कभी जांच नहीं हुई. घोटाला माफिया इतने ताकतवर हो गये थे, कि उन्होंने एक जमाने में केंद्र की सत्ता पर कब्जा करने के लिए घोटाले के पैसे का प्रयोग करने की प्लानिंग बनायी थी. वह तो गनीमत है कि कोर्ट ने इस मामले के जांच के आदेश दे दिये.

 

ऐसा नहीं है कि उस दौरान विभाग में ईमानदार अधिकारियों की कमी थी. उस वक्त के विभाग के सचिव के बी सक्सेना ने कुछ कड़े कदम उठाने शुरू किये, तो उनका तबादला कर दिया गया. उन्हीं अधिकारियों में शामिल थे. टीएस रामानुजम, जिन्हें घोटाला माफियाओं ने विभाग से अलग कर दिया. इन्हें तत्काल सरकार के आदेश से पद से हटवा दिया गया. सेवानिवृत्त अधिकारी ने बताया कि उसी जमाने में बिहार के चर्चित पुलिस अधिकारी किशोर कुणाल ने राजनेताओं और माफियाओं के गठजोड़ को तोड़ने की कोशिश की और पटना के एक चर्चित होटल में हुए श्वेत निशा त्रिवेदी हत्याकांड की जांच शुरू की. उसके बाद माफियाओं की नजर किशोर कुणाल को ठिकाने लगाने पर पड़ी और उन्होंने इन्हें परेशान करना शुरू कर दिया.

 

इन सबके पीछे घोटाले के माफियाओं के अलावा विभागीय अधिकारियों का भी हाथ था, जो कानून को अपने ठेंगे पर लेकर चलते थे. उसी दौरान बिहार मुंबई की एक चर्चित हिरोईन को बुलाकर मुझको राणा जी माफ करना गाने पर डांस भी कराया गया था, जो काफी चर्चा में रहा था. यह डांस का कार्यक्रम राजकीय अतिथिशाला में आयोजित किया गया था. सेवानिवृत्त पदाधिकारी ने बताया कि चारा घोटाले में पैसे का आवक तब और बढ़ने लगा जब सरकार ने उस वक्त गलत तरीके से पशुपालन माफियाओं के मोहरे डॉ. राम राज्य राम को विभाग का निदेशक बनाया और ए के चौधरी को सचिव बना दिया. पशुपालन विभाग का कर्मचारी संगठन इस घोटाले के विरोध में स्वर बुलंद करने लगा, तो उस संगठन पर माफियाओं से सांठ-गांठ करने वाले आर के राणा को भी बैठा दिया गया और कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री का संरक्षण पूरी तरह घोटाले को मिलने लगा.

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