भागलपुर में महिला ने फांसी लगाकर की आत्महत्या, सुसाइड नोट में लिखा बीमारी से हूँ डिप्रेशन में

मां ऐसी ही होती है। जबतक सांस हो, बच्चों के लिए जीती हैं और जब सांसें छूटने लगें तो भी बच्चे ही जेहन में होते हैं। सोमवार को भागलपुर के आदमपुर में सुसाइड करने वाली अनुभूति गिरि जायसवाल ने अपनी अंतिम चिट्‌ठी में यही लिखा। दो साल से कैंसर झेलते-झेलते टूट चुकीं अनुभूति ने अपने ससुराल, मायके,पति…सभी को उनकी सेवा के लिए धन्यवाद कहते हुए अंतिम इच्छा लिखी कि उनकी जमीन बेटे को दे दी जाए। पॉलिसी के पैसे भी दोनों बच्चों में बांट दिए जाएं।

घटना आदमपुर थाना क्षेत्र के वार्ड नंबर 21 की है, जहां दवा व्यवसायी संजीव जायसवाल उर्फ बंटी की पत्नी अनुभूति गिरी जायसवाल ने आत्महत्या कर ली। मृतका के देवर संदीप जायसवाल ने बताया कि उनके भैया (संजीव जायसवाल) दोनों बच्चों को लेकर पैतृक गांव(मथुरापुर) गए थे। सोमवार सुबह काफी देर तक भाभी के रूम का गेट नहीं खुला तो बाहर से आवाज लगाई।

लेकिन अंदर से कुछ जवाब नहीं मिला। इसके बाद सुबह पौने 11 बजे तक जब उसका दरवाजा नहीं खुला तो बाहर से आवाज लगाई। लेकिन, कमरे के अंदर से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद खिड़की से झांका तो वह दंग रह गए। पंखे से उनकी लाश लटक रही थी। इसके बाद परिवार वाले और पुलिस को मामले की जानकारी दी।

सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस के अनुसार घरवालों से पूछताछ के दौरान पता चला कि मृतका पिछले 2 सालों से कैंसर से पीड़ित थी। उसका इलाज चल रहा था। शव के पास से एक सुसाइड नोट मिला है। मामले में आगे की कार्रवाई की जा रही है।

अपनी दिल की बातों को कागज पर बयां कर चली गईं

मौत को गले लगाने से पहले अनुभूति ने कागज पर अपनी दिल की बातें लिखीं। उन्होंने सुसाइड नोट में लिखा “मैं अनुभूति गिरी जायसवाल… अपनी मर्जी से खुदखुशी कर रही हूं। मैं पिछले 2 साल से गंभीर बीमारी से ग्रसित हूं। इसी वजह से मैं बहुत फर्स्टेट हो गई हूं। मुझे अपनी बीमारी के सिवाय और कोई परेशानी नहीं है। मेरे ससुराल वाले और मेरे पति बहुत अच्छे हैं। वह मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। मैं भी अपने बच्चों के साथ अपनी जिंदगी बिताने के सपने देखती थी।

लेकिन, इस बीमारी ने मुझे तोड़ कर रख दिया है। इन 2 साल में मैंने बहुत कुछ सहा है। दवाइयां और डॉक्टर से तो मैं परेशान हो गई हूं। इन सब से मैं परेशान होकर ही ऐसा कर रही हूं। मेरे नाम से जो भी LIC है, वह मेरे दोनों बच्चों को दिया जाए। मेरे नाम से जो भी जमीन है, वह मेरे बेटे को दिए जा रही हूं। यह डिसीजन एक-दो दिनों का नहीं बल्कि पिछले 5 महीनों से मेरे दिमाग में चल रहा था। इस बीमारी ने मुझे तोड़ कर रख दिया मैं अपनी मां से माफी मांगती हूं।

उन लोगों ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है मुझे अपने बच्चों को छोड़कर जाने का बहुत दुख है लेकिन मैं बहुत मजबूर हूं अपनी किस्मत से। भगवान से यही कहना है उन्हें अच्छी जिंदगी में मेरी अंतिम इच्छा यही है कि मेरे शरीर को मुखाग्नि मेरा बेटा ही दे और आर्य समाज से ही मेरी अंतिम क्रिया की जाए अपने बच्चों के बेहतर बेहतर भविष्य की कामना करती हूं।”

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