बात अगस्त, 1890 की है। स्वामी विवेकानंद अपने गुरुभाई स्वामी अखंडानंद के साथ भागलपुर में थे। मनमंथनाथ चौधरी एक सुबह अपने बरारी स्थित घर की दहलीज पर बौद्ध धर्म से संबंधित एक पुस्तक पढ़ रहे थे। अचानक स्वामी विवेकानंद अपने गुरुभाई के साथ उनके दरवाजे पर पहुंच गए। उन्हें साधारण साधु समझ श्री चौधरी ने अनमने भाव से बिठाया और भोजन कराया। भोजनोपरांत स्वामी जी ने श्री चौधरी से पूछा कि वे क्या पढ़ रहे हैं? उन्हें हिकारत भरी निगाह से देखते हुए श्री चौधरी ने शीर्षक बताते हुए पूछा-अंग्रेजी जानते हैं? स्वामी जी ने कहा-हां, थोड़ी-बहुत। जब बौद्ध धर्म पर अंग्रेजी पुस्तकों का उद्धरण देते हुए नरेंद्र ने बोलना शुरू किया तो श्री चौधरी अवाक रह गए।

 

इस पूरी घटना की चर्चा मनमंथनाथ चौधरी ने स्वामी विवेकानंद के शिष्य को लिखे पत्र में की है। इस पत्र का उल्लेख विवेकानंद केन्द्र, कन्याकुमारी से प्रकाशित पुस्तक ‘वांडरिंग मांक ऑफ इंडिया’ में है। श्री चौधरी मध्यमवर्गीय परिवार के कट्टर ब्रह्मासमाजी थे। इनकी लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि थी। पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैंने स्वामी जी के संस्कृत ज्ञान की भी परीक्षा ली। उपनिषद और योग पर हुई विशेष चर्चा से उन्हें स्वामी जी की प्रतिभा का भान हुआ। जब स्वामी विवेकानंद भागलपुर आए तो सर्वप्रथम कुमार नित्यानंद सिंह के यहां अतिथि बने थे। लेकिन बाद में मनमंथ नाथ चौधरी के यहां एक सप्ताह से अधिक ठहरे थे। बरारी पानी टंकी घाट पर बैठकर उन्होंने चिंतन, गंगास्नान और संध्या आरती की थी। आज यहां उनकी प्रतिमा स्थापित है।

 

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गीत सुन भूख तक भूल गए श्रोता

 

भागलपुर प्रवास क्रम में एक दिन मनमंथनाथ चौधरी ने ही स्वामीजी की संगीत में रुचि देख उनसे कुछ सुनाने का अनुरोध किया था। स्वामीजी की स्वीकृति के पश्चात स्थानीय संगीतज्ञों की एक छोटी सी सभा हुई थी। रात में दो बजे तक वे बिना थके एक के बाद एक गीत गाते रहे। स्थिति यह हो गई कि सारे के सारे आमंत्रित गायक और श्रोता भूखे रहकर उनके गान का रसास्वादन करते रहे। भागलपुर के कैलाश बाबू तबले पर स्वामीजी का साथ दे रहे थे। उनकी अंगुलियां सख्त और संवेदनहीन हो गई। संगीत का ऐसा समां बंधा कि दूसरे दिन भी सारे लोग पुन: गीत सुनाने का अनुरोध लेकर उनके पास पहुंचे पर स्वामी जी ने इनकार कर दिया।

 

एक दिन जब उनसे शहर के धनाढ्य व्यक्तियों से मिलने का अनुरोध श्री चौधरी ने किया तो वे नाराज हो गए और फिर कुछ दिन बाद अचानक विवेकानंद शहर छोड़कर चले गए।

 

यहां यह जिक्र करना प्रासंगिक होगा कि श्री चौधरी के साथ स्वामी जी के कई पत्राचार हुए थे। अपने पत्रोत्तर में स्वामी जी ने आध्यात्मिक भावों को रखा था। भागलपुर के एक वकील मथुरानाथ सिन्हा ने भी अपने पत्र में स्वामी जी के भागलपुर प्रवास और उनके विशद ज्ञान की चर्चा की है।

 

विवेकानंद केन्द्र, कन्याकुमारी के प्रांत प्रमुख डॉ. विजय कुमार वर्मा बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने अपने धर्मगुरु स्वामी अखंडानंद को 21 फरवरी, 1900 को एक पत्र लिखकर भागलपुर में अशिक्षा पर चिंता जताते हुए लिखा था कि भागलपुर में एक ऐसे शिक्षण केन्द्र की निहायत जरूरत है, जो यहां युवाओं को सही दिशा दे। इसी को ध्यान में रखकर विवेकानंद केन्द्र लगातार कार्यक्रम चला रहा है।

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