Tax Returns भरने वाले 31 मार्च से पहले निपटा लें यह काम, तो नहीं रहेगा माथे पर टेंशन

वित्त वर्ष 2017-18 का यह आखिरी महीना मार्च चल रहा है. करीब 18 दिन बाद नये वित्त वर्ष 2018-19 का पहला महीना अप्रैल शुरू हो जायेगा आैर इसी के साथ शुरू हो जायेगा टैक्स रिटर्न्स भरने वालों की अफरा-तफरी. एेसे में यदि आप समय रहते आने वाले वित्त वर्ष 2018-19 के पहले महीने अप्रैल में किये जाने वाले टैक्स से संबंधित अहम कामों को पूरा करने की योजना पूर्व में ही बना लें, तो समय आने पर आपको परेशानियों से रूबरू नहीं होना पड़ेगा.

इन अहम कामों में मौजूदा वित्त वर्ष में हुए विभिन्न लाभ का हिसाब-किताब करने से लेकर टैक्स बचाने के लिए निवेश के पोर्टफोलियो तक का विश्लेषण करने आदि के महत्वपूर्ण वित्तीय कार्य शामिल हैं. आइये, हम जानते हैं कि अप्रैल का महीना आने के पहले हमें किन-किन कामों को निपटा लेना चाहिए.

 

लाॅन्ग टर्म कैपिटल गेंस का आकलन कर लेना बेहद जरूरी

बजट में बुजुर्गों के लिए की गयी व्यवस्था से इक्विटीज पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (एलटीसीजी) टैक्स का दर्द कम हुआ है, लेकिन एलटीसीजी का आकलन पेचीदा हो गया है. एलटीसीजी की गणना करने के लिए निवेशकों को याद रखना होगा कि 31 जनवरी, 2018 को उनके शेयरों के दाम और म्यूचुअल फंड्स के नैट ऐसेट वैल्यू (एनएवी) क्या थे. आप आंकड़ों को एकत्र करने के लिए एक्सेल शीट की मदद ले सकते हैं, लेकिन फ्री पोर्टफोलियो ट्रैकर साइन अप करना बेहतर विकल्प है. वैल्यु रिसर्च ने भी इसे लॉन्च किया है. इससे एलटीसीजी की गणना का काम बेहद आसान हो जायेगा.

मार्च खत्म होने के पहले कर सकते हैं प्राॅफिट्स की बुकिंग

एलटीसीजी टैक्स की 10% की दर आगामी एक अप्रैल, 2018 से ही लागू हो पायेगा. ऐसे में टैक्स विशेषज्ञ 31 मार्च से पहले प्रॉफिट्स बुकिंग की सलाह दे रहे हैं. हालांकि, ऐसा तभी करें, जब रकम अच्छी-खासी हो. अगर आप अच्छा प्रदर्शन करनेवाले शेयरों को अपने पोर्टफोलियो में बरकरार रखना चाहते हैं, तो उसे बेचकर मुनाफा कमा लें और कुछ दिनों के बाद फिर से खरीद लें. आपको वैसे शेयर नहीं बेचने चाहिए, जिसने अच्छा प्रदर्शन किया. आप उन शेयरों को बेच सकते हैं, जो 31 जनवरी की कीमत के मुकाबले कम दाम पर ट्रेड कर रहे हों. अगर आपने कोई शेयर लंबे समय से रखा है और अभी उसकी कीमत खरीद के दाम से घट गयी है, तो इसे एक अप्रैल के बाद ही बेचें.

साल खत्म होने के पहले ही कर लें दो सालों का रिटर्न्स फाइल

नये बजट के अनुसार, अब दो सालों के टैक्स रिटर्न्स एक साथ फाइल करने की सुविधा खत्म हो चुकी है. इस साल से आकलन वर्ष के अंदर ही टैक्स रिटर्न फाइल कर सकते हैं. इसका मतलब है कि आप 2015-16 और 2016-17 के रिटर्न्स 31 मार्च, 2018 तक ही फाइल कर सकते हैं. यह समयसीमा पार करती है, तो आपको जुर्माना देना पड़ेगा. अगर आपको टैक्स फाइलिंग को लेकर कोई उलझन है, तब भी 31 जुलाई, 2018 से पहले तक तो रिटर्न्स फाइल कर ही दें. अगर जरूरी हो, तो फिर 31 मार्च, 2019 से पहले तक रिवाइज्ड रिटर्न फाइल कर सकते हैं. जुर्माने से बचने का यह कारगर तरीका है. देर से रिटर्न्स फाइलिंग का एक नुकसान लॉस एडजस्टमेंट को लेकर होता है. अगर आपको कारोबारी नुकसान, शॉर्ट या लॉन्ग टर्म कैपिटल लॉस आदि हुआ हो, तो आपको समयसीमा के अंदर टैक्स रिटर्न्स फाइल करना होगा, अन्यथा अगले वित्त वर्ष में लॉस कैरी फॉरवर्ड करने का लाभ नहीं मिल पायेगा.

पोर्टफोलिया रिव्यू करना बेहद जरूरी

आपको सालाना या छमाही आधार पर अपना इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो जरूर रीव्यू करना चाहिए. एलटीसीजी के आगमन से यह और भी जरूरी हो गया है. रीव्यू का कतई मतलब नहीं कि आप पोर्टफोलियो में बदलाव करें ही. समीक्षा कई स्तरों पर की जाती है. पहले तो यह जांच कर लें कि क्या आपका फंड का आवंटन सही है. दूसरा यह देखें कि कौन से शेयर और म्यूचुअल फंड्स में किसका प्रदर्शन बेहतर है. जिनका प्रदर्शन अच्छा है, उनका क्या? क्या उनसे निकल जाना चाहिए? विशेषज्ञ बताते हैं कि एक साल का प्रदर्शन देखकर किसी म्यूचुअल फंड से निकल जाना समझदारी नहीं है, बल्कि इसके खराब प्रदर्शन के कारण का पता लगाना चाहिए.

टैक्स प्लानिंग के पहले निवेश की रकम कर लें तय

अक्सर, लोग टैक्स सेविंग्स इन्वेस्टमेंट्स को वित्त वर्ष के आखिर तक टालते रहते हैं और गलत जगह पैसे लगा देते हैं. वित्त वर्ष की शुरुआत में टैक्स प्लानिंग कर लें और सबसे पहले निवेश की रकम का अंदाजा लगा लें. फिर जिन निवेशों पर इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80सी में टैक्स छूट प्राप्त है, उन पर विचार करें. इसमें बच्चों के ट्युइशन फी, हाउजिंग लोन ईएमआई का मूलधन, इंश्योरेंस पॉलिसी का सालना प्रीमियम आदि में निवेश किया जा सकता है. इनमें निवेश के बाद जो पैसे बचें, उन्हें इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स में डाल दें. इक्विटी इंस्ट्रूमेंट्स के लिए एसआईपी और ईएलएसएस शुरू कर सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरी हो, तो डेट इंस्ट्रूमेंट्स में एक निश्चित रकम डाल दें. इसके लिए 5 अप्रैल 2018 से पहले पीपीएफ जैसी स्कीम में पैसे लगा दें, ताकि आपको कंपाउंडिंग का पूरा-पूरा लाभ मिल सके. इसके लिए आपको सालाना बोनस या अन्य साधनों से मिली मोटी रकम लगानी चाहिए. अगर आप मासिक आधार पर निवेश करना चाहते हैं, तो हर महीने की 5 तारीख से पहले निवेश कर दें, ताकि पूरे महीने का ब्याज मिल जाये.

ब्याज दरों में हालिया कटौती के बावजूद एंप्लॉयीज प्रविडेंट फंड (ईपीएफ) डेट इन्वेस्टमेंट प्रॉडक्ट्स में सबसे ज्यादा ब्याज दनेवाले इंस्ट्रूमेंट्स में शुमार है. ईपीएफ और पीपीएफ रिटर्न्स में अच्छा-खासा अंतर है. विशेषज्ञों के मुताबिक, भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा. ईपीएफ निवेशकों को वॉलंटरी प्रविडेंट फंड (वीपीएफ) के जरिये स्कीम में ज्यादा पैसे लगाने की अनुमति होती है. खास बात यह है कि इसमें पीपीएफ के 1.5 लाख रुपये की सीमा जैसी कोई ऊपरी सीमा नहीं होती है. ज्यादातर कंपनियां वीपीएफ शुरू करने के लिए वित्त वर्ष की शुरुआत में ही अनुमति देने की सुविधा देती है. लिहाजा, जल्दी से कंपनी के एचआर या अकाउंट डिपार्टमेंट को अप्रैल महीने से वीपीएफ की स्वतः कटौती का आदेश दे दें. ईपीएफ में संकट के वक्त पैसे निकालने की सुविधा है, लेकिन इसमें लॉकइन पीरियड होने के कारण वीपीएफ के जरिये इसमें अतिरिक्त पैसे डालने से पहले सोच लें, क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर ईपीएफ और वीपीएफ की रकम रिटायरमेंट के वक्त ही मिलती है. वहीं, पीपीएफ ज्यादा लचीला है. ऐसे में, एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि युवावस्था में इक्विटी ऑरियेंटिड ग्रोथ प्रॉडक्ट्स में निवेश करें और अधेड़ उम्र में इसे वीपीएफ जैसे डेट ऑरियेंटिड प्रॉडक्ट्स में शिफ्ट कर दें.

बोनस के पैसे चुकाएं जरूरी कर्ज की राशि

ज्यादातर लोगों को मार्च या अप्रैल महीने में बोनस की रकम मिल जाती है, लेकिन बहुत कम लोगों के पास इसके निवेश की योजना होती है. अगर आपने ऊंची ब्याज दर पर लोन ले रखी है, क्रेडिट कार्ड का बकाया आदि है, तो बोनस के पैसे से सबसे पहले कर्ज चुकाएं. तीन फीसदी हर महीने की दर से ब्याज देना बुद्धिमानी नहीं है. बाकी रकम को खर्च और निवेश में बांट लें. एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बोनस के पैसे के दम पर मौज-मस्ती नहीं करें.

 

फिक्स्ड और रिकरिंग डिपॉजिट में पैसे डालने वालों के लिए टैक्स डिडक्टेड एट सॉर्स (टीडीएस) बड़ी चिंता होती है. अभी सालाना 10,000 रुपये से ज्यादा ब्याज की कमाई पर बैंक टीडीएस काट लेते हैं. इससे बचने का एक ही तरीका है 15जी या 15एच फॉर्म जमा करना. फॉर्म 15एच वरिष्ठ नागरिकों के लिए होता है, जबकि 60 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति के लिए फॉर्म 15जी है. चूंकि टीडीएस की गणना करते हुए बैंक एक साल में दिये गये पूरे ब्याज की जगह एक साल में दिये जाने योग्य ब्याज का आकलन करते हैं. इसलिए टीडीएस वित्त वर्ष के शुरू में ही कट जाता है. ऐसे में अप्रैल के पहले सप्ताह में ही उचित फॉर्म भरना जरूरी है.

टैक्स लगने वालों को फाॅर्म भरना नहीं है जरूरी

हालांकि, जिनकी इनकम इतनी है कि उन पर टैक्स लगना ही लगना है, तो फॉर्म 15जी या 15जी भरने की जरूरत नहीं है. अगर आपने अवैध रूप से फॉर्म भर दिया, तो इनकम टैक्स विभाग आप पर कार्रवार्इ सकता है. सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 के बजट में वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज से कमाई की टैक्स फ्री लिमिट 10,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दी. ऐसे में ब्याज से 50,000 रुपये तक की सालाना की कमाई हो रही हो, तो वरिष्ठ नागरिक फॉर्म 15एच जमा कर सकते हैं. ध्यान रहे कि सेक्शन 80टीटीबी के तहत 50,000 की यह सीमा सभी बैंकों और पोस्ट ऑफिसों में जमा की गयी रकम से मिले ब्याज को लेकर है.

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